चीन-नेपाल में गहराती दोस्ती पर इतना शांत क्यों है भारत

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नेपाल के दौरे पर जा रहे हैं. वो 12 और 13 अक्टूबर को नेपाल में रहेंगे.
नेपाल में इस दौरे की भरपूर तैयारियां चल रही हैं. इसकी ख़ास वजह भी है क्योंकि 23 साल बाद कोई चीनी राष्ट्रपति नेपाल पहुंच रहा है.
नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के विदेश मामलों के सलाहकार डॉ. राजन भट्टाराई ने इस दौरे को ऐतिहासिक बताया है.
उन्होंने बताया कि चीन के राष्ट्रपति के साथ उनका एक प्रतिनिधि दल भी होगा.
दोनों देशों के बीच कई समझौते होने की बात भी कही जा रही है. चीन के राष्ट्रपति और नेपाल के प्रधानमंत्री के बीच आधिकारिक बैठक भी तय हुई है.
नेपाल जाने से पहले चीन के राष्ट्रपति भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अनौपचारिक मुलाक़ात करेंगे. इससे पहले शी जिनपिंग पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के साथ भी बैठक कर चुके हैं.
चीन का प्रभाव दक्षिण एशिया में लगातार बढ़ रहा है. वो चाहे नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान या बांग्लादेश हो. हर जगह चीन की मौजूदगी बढ़ी है. ये सभी देश चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना में शामिल हो गए हैं. दूसरी तरफ़ भारत इस परियोजना के पक्ष में नहीं है.

नेपाल की तरफ़ बढ़ता चीन

इस हिंदू बहुल राष्ट्र में चीन का दिलचस्पी लेना काफ़ी अहम है. नेपाल अपनी कई ज़रूरतों के लिए भारत पर निर्भर है लेकिन वो लगातार भारत से निर्भरता को कम करने की कोशिश कर रहा है.
चीन ने साल 2017 में नेपाल के साथ अपनी बेल्ट एंड रोड परियोजना के लिए द्विपक्षीय सहयोग पर समझौता किया था. इस दौरान चीन ने नेपाल में क्रॉस-बॉर्डर इकोनॉमिक ज़ोन बनाने, रेलवे को विस्तार देने, हाइवे, एयरपोर्ट आदि के निर्माण कार्यों में मदद पहुंचाने पर भी सहमति जताई.
नेपाल के कई स्कूलों में चीनी भाषा मंदारिन को पढ़ना भी अनिवार्य कर दिया गया है. नेपाल में इस भाषा को पढ़ाने वाले शिक्षकों के वेतन का खर्चा भी चीन की सरकार ने उठाने के लिए तैयार है.
नेपाल में चीन की अमरीका से टक्कर
दरअसल, नेपाल के क़रीब जाने की कोशिश अकेला चीन ही नहीं बल्की अमरीका भी लगातार कर रहा है. एक तरफ़ जहां चीन अपनी बेल्ड एंड रोड परियोजना चला रहा है तो वहीं अमरीका इंडो-पैसिफ़िक नीति पर काम कर रहा है.
नेपाल में केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनने के बाद से ही अमरीका और चीन नेपाल के क़रीब जाने की कोशिशें कर रहे हैं.
इसी साल जून में अमरीकी रक्षा विभाग ने इंडो-पैसिफ़िक स्ट्रैटिजी रिपोर्ट (आईपीएआर) प्रकाशित की थी. इस रिपोर्ट में नेपाल के बारे में लिखा गया था, ''अमरीका नेपाल के साथ अपने रक्षा सहयोगों को बढ़ाना चाहता है. हमारा ध्यान आपदा प्रबंधन, शांति अभियान, ज़मीनी रक्षा ताक़त को बढ़ाने और आतंकवाद से मुक़ाबला करने पर है.''
हालांकि इसके जवाब में नेपाल सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों ने कहा था कि नेपाल कोई भी ऐसा सैन्य गठबंधन नहीं करेगा जिसका निशाना चीन पर होगा.
दरअसल, चीन के प्रति नेपाल के इस रुख़ की भी ख़ास वजह है. चीन नेपाल में अपनी राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक छाप छोड़ रहा है. चीन ने ही नेपाल से अमरीका की इंडो-पैसिफ़िक नीति में शामिल ना होने की अपील की है.
नेपाल भी यह मानता है कि अमरीका की इंडो-पैसिफ़िक नीति असल में सैन्य नीति है और वो ख़ुद इसमें नहीं उलझेगा.

चीन और नेपाल के बीच चर्चा

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेपाल दौरे की तैयारियों को लेकर चीन के विदेश मंत्री वांग यी सितंबर में नेपाल गए थे. वांग यी ने इस दौरान नेपाल के प्रधानमंत्री, मंत्रियों और विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं के साथ मुलाक़ात की थी.
इन मुलाक़ातों में अमरीका की नीतियों पर भी चर्चा की गई थी. नेपाल के प्रधानमंत्री ओली के साथ बैठक के बाद चीन के रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से जो बयान जारी किया गया था उसमें कहा था, ''नेपाल की तरफ़ से उन प्रयासों को रोका जाएगा जो चीन को उसके नज़दीक आने में रुकावटें पैदा करेंगे.''
चीन के विदेश मंत्री ने जब नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल से मुलाक़ात की तो उसमें भी इन्हीं बातों को दोहराया. इस मुलाकात के बाद जारी बयान में कहा गया, ''चीन के विकास से नेपाल में भी कई अवसर पैदा होंगे.''
इन बयानों के बाद कांठमांडू में स्थित अमरीकी दूतावास की ओर से नेपाल विदेश मंत्रालय से स्पष्टीकरण भी मांगा गया था. इसके जवाब में नेपाल ने यही कहा था कि वो किसी देश के साथ सैन्य गठजोड़ ना करने की अपनी नीति पर कायम हैं.

जिनपिंग का पहला नेपाल दौरा

इस साल चीन के कई उच्चस्तर के अधिकारी और राजनेता नेपाल के दौरे पर आ चुके हैं. ये तमाम दौरे शी जिनपिंग की नेपाल यात्रा की राह तैयार कर रहे थे.
दरअसल, 23 साल बाद कोई चीनी राष्ट्रपति नेपाल के दौरे पर पहुंच रहा है. साल 1996 में जियांग ज़ेमिन ने नेपाल का दौरा किया था.
शी जिनपिंग दक्षिण एशिया के अन्य देश जैसे भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव और श्रीलंका के दौरे पर जा चुके हैं लेकिन अभी तक वो नेपाल नहीं गए थे.
माना जा रहा है कि इस दौरान बेल्ट एंड रोड परियोजना पर भी नेपाल और चीन के बीच बातचीत होगी. नेपाल को बीआरआई में शामिल हुए दो साल हो चुके हैं लेकिन अभी तक उसने इस परियोजना के तहत कोई ख़ास प्रोजेक्ट शुरू नहीं किया है.
यही वजह है कि नेपाल पर अब बीआरआई का कोई प्रोजेक्ट शुरू करने का दबाव भी होगा.
शी जिनपिंग के नेपाल पहुंचने से पहले ही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना (सीपीसी) ने नेपाल की सत्ताधारी पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के साथ काम करना शुरू कर दिया है. इन दोनों दलों में विचारधारा के मामले में भी समानता है.
सीपीसी के 40 सदस्यों का एक दल 23 सितंबर को काठमांडू पहुंच गया था जहां उन्होंने एनसीपी के साथ मिलकर एक संयुक्त सत्र में भाग लिया.
चीन की नज़दीकी, भारत को चुनौती?
नेपाल और चीन की दोस्ती को भारत के लिए बड़ी चुनौती समझा जा रहा है. एक तरफ़ जहां चीन और अमरीका लगातार नेपाल में सक्रिय हैं वहीं भारत अभी तक इस संबंध में शांत रहा है.
नेपाल की मौजूदा सरकार भी भारत की तर्ज पर चीन को तरजीह देती हुई दिखाई देती है. नेपाल ने इसी साल पुणे में आयोजित बिम्सटेक देशों के सैन्य अभ्यास में शामिल होने से इनकार कर दिया था, लेकिन इसके बाद नेपाल ने चीन की सेना के साथ 12 दिनों का सैन्य अभ्यास करने पर सहमति जताई थी.
इतिहास पर नज़र दौड़ाएं तो वहां भी ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं जब चीन ने भारत को चुनौती देने के लिए नेपाल का रास्ता अपनाया है. आधुनिक चीन के निर्माता कहे जाने वाले डांग श्यापेंग ने फ़रवरी 1978 में म्यांमार (उस समय का बर्मा) और नेपाल का दौरा किया था.
डांग उस समय भले ही चीन के प्रमुख नहीं थे लेकिन वो उस वक़्त चीन के सर्वोच्च अधिकारी थे. उस समय उनका नेपाल दौरा भारत को चुनौती के तौर पर देखा गया था. उनके दौरे से ठीक एक महीने पहले भारत के तत्तकालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने नेपाल का दौरा किया था.
नेपाल उस वक़्त भारत और चीन दोनों के साथ अपने रिश्ते मज़बूत करने की कोशिशें कर रहा था.
नेपाल एक लैंडलॉक्ड देश है और वो भारत से अपनी निर्भरता कम करना चाहता है. 2015 में भारत की तरफ़ से अघोषित नाकाबंदी की गई थी और इस वजह से नेपाल में ज़रूरी सामानों की भारी किल्लत हो गई थी. तब से दोनों देशों के बीच संबंधों में वो भरोसा नहीं लौट पाया है.
इसी बीच चीन और नेपाल के रिश्तों में एक और प्रगति सामने आई है. नेपाल सरकार ने कहा है कि चीन उसे अपने पोर्ट को इस्तेमाल करने की इजाज़त दी है. नेपाल के वाणिज्य मंत्रालय ने कहा था कि उसे चीन ने थिंयान्जिन, शेंज़ेन. लिआनीयुगैंग और श्यांजियांग पोर्ट के इस्तेमाल की अनुमति दे दी है.
चीन का भारत के हर पड़ोसी देश में अपनी पैठ मज़बूत करता जा रहा है.
नेपाल के नए संविधान पर भारत के असंतोष पर नेपाल की ओली सरकार कहती रही है कि यह उसका आंतरिक मामला है. भारत और नेपाल के बीच 1950 में हुए पीस एंड फ्रेंडशिप संधि को लेकर ओली सख़्त रहे हैं.
उनका कहना है कि संधि नेपाल के हक़ में नहीं है. इस संधि के ख़िलाफ़ ओली नेपाल के चुनावी अभियानों में भी बोल चुके हैं. ओली चाहते हैं कि भारत के साथ यह संधि ख़त्म हो.
दोनों देशों के बीच सीमा विवाद भी एक बड़ा मुद्दा है. सुस्ता और कलपानी इलाक़े को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद है. चार साल पहले दोनों देशों के बीच सुस्ता और कलपानी को लेकर विदेश सचिव के स्तर की बातचीत को लेकर सहमति बनी थी, लेकिन अभी तक एक भी बैठक नहीं हुई है.
ओली जब भारत आते हैं तो उन पर दबाव होता है कि इन दोनों मुद्दों पर बातचीत करें, लेकिन द्विपक्षीय वार्ताओं में इनका ज़िक्र नहीं होता है.
नंवबर 2016 में मोदी सरकार ने अचानक से जब 500 और एक हज़ार के नोटों को चलन से बाहर कर दिया तो नेपाल भी इससे प्रभावित हुआ.
नेपाल में भी भारतीय नोट लेन-देन के आम चलन में हैं और जब ये नोट रद्द किए गए तो वहां के लोग और अर्थव्यस्था पर बुरा असर पड़ा.
नेपाल ने भारत से पुराने नोटों को बदलने का आग्रह किया और दोनों देशों के बीच बातचीत भी शुरू हुई, लेकिन अब भी मामला सुलझा नहीं है. इस मामले में कोई आधिकारिक तस्वीर नहीं होने की वजह से भी मामल अटका हुआ है.
6 अप्रैल को ओली ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉ़न्फ़्रेंस को संबोधित करते हुए कहा था, ''भारतीय निवेशक दुनिया भर के देशों में निवेश कर रहे हैं, लेकिन अपने पास के ही नेपाल में नहीं करते हैं. आख़िर ऐसा क्यों है? हम भौगोलिक रूप से पास में हैं, आना-जाना बिल्कुल आसान है, सांस्कृतिक समानता है और ऐसा सब कुछ है जो दोनों देशों को भाता है फिर भी निवेश क्यों नहीं होता?''

भारत समर्थक थे ओली?

ओली के बारे में कहा जाता है कि वो विदेशी संबंधों में अपने दो बड़े पड़ोसी भारत और चीन के बीच संतुलन बनाकर रखना चाहते हैं.
ओली के बारे में कहा जाता है कि वो कभी भारत समर्थक कहे जाते थे. नेपाल की राजनीति में उनका रुख़ भारत के पक्ष में कभी हुआ करता था.
1996 में भारत और नेपाल के बीच हुए ऐतिहासिक महाकाली संधि में ओली की बड़ी भूमिका मानी जाती है. ओली 1990 के दशक में नेपाल में कैबिनेट मंत्री हुआ करते थे. वो 2007 तक नेपाल के विदेश मंत्री भी रहे थे. इस दौरान ओली के भारत से काफ़ी अच्छे ताल्लुकात थे.
नेपाल पर भारत का प्रभाव दशकों से रहा है. दोनों देशों के बीच खुली सीमा है, बेशुमार व्यापार है, एक धर्म है और रीति रिवाज़ भी एक जैसे हैं. दोनों देशों के बीच बिगड़ते संबंधों को लेकर जब बात होती है तो चीन का ज़िक्र ज़रूरी रूप से होता है.
चीन ने हाल के वर्षों में नेपाल में भारी निवेश किया है. नेपाल में चीन कई प्रोजेक्टों पर काम कर रहा है और इसमें बुनियादी ढांचों सी जुड़ी परियोजनाएं सबसे ज़्यादा हैं. चीन नेपाल में एयरपोर्ट, रोड, हॉस्पिटल, कॉलेज, मॉल्स बना रहा है तो एक रेलवे लाइन पर भी काम कर रहा है.

भारत का विकल्प बना चीन?

कॉर्नेगी इंडिया के एनलिस्ट कॉन्स्टैन्टिनो ज़ेवियर ने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा है, ''नेपाल और चीन की क़रीबी एक बड़ा परिवर्तन है. यह नेपाल के इतिहास में पहली बार है कि चीन नेपाल को भारत का विकल्प मुहैया करा रहा है.''

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