'मायावती उत्तर प्रदेश में रहेंगी या मिटेंगी?'

साल 2007 में बसपा सुप्रीमो मायावती के इतिहास रचने के बाद से गोमती नदी में बहुत सारा पानी बह चुका है. उन्होंने ब्राह्मणों, मुसलमानों और दलितों का एक अजेय गठजोड़ रच कर बाज़ी मारी थी.
उनसे पहले इसी समीकरण के बूते कांग्रेस आजादी के बाद चार दशकों तक उत्तर प्रदेश में शासन कर पाई थी. 1992 में बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद कांग्रेस ने अपना जनाधार गंवा दिया और सत्ता से बाहर हो गई.
दूसरा यह कि मायावती ने 2007 में राज्य में 14 सालों से चले आ रही गठबंधन सरकारों के दौर को खत्म कर दिया. बसपा को इस दफ़ा अपने बूते बहुमत मिला था.
इस चौंका देने वाली कामयाबी के बाद मायावती राष्ट्रीय स्तर की नेता बन गईं. कई लोगों का यह मानना था कि देश के सबसे बड़े दलित नेता जगजीवन राम की खाली जगह को मायावती भर सकती हैं.

दलित वोट बैंक
हालाँकि ऐसा हो नहीं पाया. देश भर में कई जगहों पर चुनाव लड़ने के बाद मायावती धीरे-धीरे अपनी अखिल भारतीय छवि खोने लगीं.
मायावती के उभार ने दलितों को आवाज दी और उन्हें ऐसा लगने लगा कि यह वोट बैंक उनकी जागीर है. दलित चट्टान की तरह मायावती के पीछे खड़े रहे क्योंकि उन्हें पहली बार ऐसा लगा कि उनकी अपनी बिरादरी का कोई सरकार चला रहा है.
1984 में बसपा के गठन के बाद से ही दलित ये सपना देखते आए थे. किसी दलित को प्रधानमंत्री पद पर देखकर ही उनका मिशन खत्म होगा. अब दोबारा मायावती की सत्ता में वापसी को लेकर उनके समर्थकों में उम्मीदें बनी हैं.
कुछ लोग तो यहां तक मानते हैं कि केवल वही विकल्प हैं. एक मजबूत इरादे वाली महिला की छवि उनके पक्ष में जाती है.
दूसरा तर्क यह भी है कि वोटर राज्य में शासन करने के लिए समाजवादी पार्टी या बसपा जैसी क्षेत्रीय पार्टी को तरजीह देगा जबकि केंद्र में सरकार बनाने के लिए किसी राष्ट्रीय पार्टी को.
बसपा की ताकत
लेकिन साल 2014 में नरेंद्र मोदी की बीजेपी ने सियासी फलक पर इतना बड़ा धमाका नहीं किया होता तो मायावती का रास्ता साफ़ होता.
विकास के मोदी के इकलौते नारे ने मायावती और मुलायम सिंह यादव के जनाधार को बीजेपी की तरफ खिसका दिया.
कई अध्ययनों में यह बात साबित हुई. इनमें से एक स्टडी सीएसडीएस ने भी की थी. मायावती के सामने एक बड़ी चुनौती राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की भी है. कार्यकाल खत्म होने के करीब पहुंचते अखिलेश की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. समाजवादी परिवार के झगड़े से अखिलेश को कोई नुकसान नहीं हुआ है.
गैर जाटव वोटों को हथिया कर बीजेपी ने बसपा के दलित जनाधार में तकरीबन सेंध लगा ही दी थी. मायावती का बुनियादी जनाधार जाटवों में है.
हालांकि राजनीतिक जानकार और कांशीराम पर किताब लिखने वाले प्रोफेसर बदरी नारायण कहते हैं, "भले ही लोग वक्त-वक्त पर पार्टी छोड़ते रहे हों लेकिन बसपा की ताकत हमेशा बढ़ी ही है."
नोटबंदी
वह कहते हैं, "उन्हें खारिज मत कीजिए. बसपा को कार्यकर्ता चलाते हैं न कि नेता."
मुमकिन है कि प्रोफ़ेसर बदरी नारायण मायावती के वफादार वोटरों को लेकर कुछ हद तक सही कह रहे हों लेकिन चुनावी जंग में लोग जीत हासिल करने तक आराम नहीं करते.
कई बार लोग ढेर सारे मंसूबे बनाते हैं और होता वही है जो होना होता है. प्रधानमंत्री के नोटबंदी वाले जुए ने सभी पार्टियों को बड़ा झटका दिया है जिसमें बसपा भी एक है.
नकदी का संकट बड़ा सवाल नहीं है, जातियों का बर्ताव उन्हें फिक्र में डाले हुए है. मतदाता खामोश हैं और अधीर भी, लेकिन इसके बावजूद लोग एक सुर में मोदी की आलोचना नहीं कर रहे हैं.
गरीब यह सोचकर खुश हैं कि अमीर अपनी दौलत गंवा रहे हैं. इनमें से कई लोग मायावती के समर्थक हैं. इसलिए तीन लोकप्रिय नेताओं- मोदी, मायावती और अखिलेश के त्रिकोणीय मुकाबले में कोई भी विजेता बन सकता है.
गठजोड़
लेकिन अगर जनता ने त्रिशंकु विधानसभा का विकल्प चुना तो वह मायावती ही होंगी जिनके दोनों हाथों में लड्डू होगा. वे कोई साझीदार खोज सकती हैं. भाजपा और कांग्रेस दोनों ही उनके साथ आने को लेकर लालायित होंगे.
बहुत से भाजपा नेता इस बात पर जोर देते हैं कि मोदी अटल बिहारी वाजपेयी से अलग हैं जिन्होंने 1995 में राज्य को पहली दलित महिला मुख्यमंत्री दी थी. आप इतिहास के पन्ने पलटकर देखिए, बसपा तब से ही मजबूत होती गई और भाजपा सिकुड़ती गई.
लेकिन मोदी की भाजपा ने कश्मीर में पीडीपी जैसे विपरीत विचार वाली पार्टी के साथ गठजोड़ तो किया ही है.
फिलहाल मायावती अपने कोर दलित वोटबैंक को मजबूत कर एक बहुमत वाली सरकार के लिए संघर्ष कर रही हैं. उन्हें मालूम है कि ब्राह्मण भाजपा या कांग्रेस किसी की तरफ खिसक सकते हैं.
मुसलमानों की पसंद
समीकरणों के लिहाज से देखें तो मायावती केवल मुसलमानों पर भरोसा कर सकती हैं लेकिन उन्हें भी डर है कि चुनावों के बाद मायावती कहीं भाजपा से फिर हाथ न मिला लें.
हालांकि उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की पहली पसंद समाजवादी पार्टी रही है लेकिन परिवार के झगड़े से बात बिगड़ भी सकती है. और अगर ऐसा हुआ तो मुसलमान वोटर अपने दूसरे विकल्प के तौर पर बसपा को चुनेगा.
पार्टी नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी पहले से ही मुस्लिम इलाकों में दौरा कर रहे हैं. किसी का पार्टी छोड़कर चला जाना मायावती के लिए नई बात नहीं है लेकिन मुसलमानों को बहन जी यूं ही जाने नहीं दे सकती हैं.
नब्बे के दशक में उन्हें तात्कालिक नेता कहकर खारिज कर दिया गया था लेकिन तब से उन्होंने कई लोगों को गलत साबित किया है. वह चार बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं.
अस्तित्व की लड़ाई
फिलहाल पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके अगले कदम का इंतजार कर रहा है. मायावती भी उनमें से एक हैं.
उनके लिए 2017 के विधानसभा चुनाव राज्य की राजनीति में अस्तित्व की लड़ाई है और भाजपा 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में अपना झंडा बुलंद करना चाहेगी.
फिलहाल सबकी नजर भाजपा पर है लेकिन मायावती छुपा रुस्तम बनने का माद्दा रखती हैं.
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